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क्या पीएम मोदी की रेटिंग सिर्फ 15 अगस्त के दिन ही अधिकतम थी?

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क्या पीएम मोदी की रेटिंग सिर्फ 15 अगस्त के दिन ही अधिकतम थी?

एनडीटीवी के लोकप्रिय एंकर रवीश कुमार ने एक बार फिर अपने अंदाज में पीएम मोदी पर हमला बोला है। बेशक इस बार भाषा और शब्दों को उपयोग थोड़ा अलग है, लेकिन रवीश अपने इस अंदाज के लिए भी जाने जाते है। जहां वो हमले करते है लेकिन जरा अलग अंदाज में।

रवीश ने फेसबुक पर लिखा कि टीवी रेटिंग एजेंसी बार्क के कार्यकारी प्रमुख पार्थो दासगुप्ता ने बिजनेस स्टैंडर्ड के लिए एक लेख लिखा है। इस लेख को ध्यान से पढ़िए। कौन सा आंकड़ा प्रतिशत में है, कौन सा लाखों में है और किस किस का कहां कहां आंकड़ा नहीं है, यह सब समझने के लिए भी पढ़ सकते हैं। मुमकिन है जानबूझ न किया गया हो, स्पेस की कमी के कारण हुआ हो, मगर मुमकिन है जानबूझ कर भी किया गया हो। मैं उनके लेख से कुछ प्वाइट्स दे रहा हूं और अपनी टिप्पणी भी।

भारत में टीवी देखने वाले 78 करोड़

रवीश ने बताया कि भारत में टीवी के कुल दर्शकों की संख्या है 78 करोड़। इसका मतलब यह हुआ कि1 अरब 20 करोड़ की आबादी में करीब 40-42 करोड़ लोग टीवी नहीं देखते हैं। इस साल अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल के दर्शकों में 114 फीसदी का इजाफा हुआ है। अंग्रेज़ी सिनेमा के दर्शक भी 15 प्रतिशत बढ़े हैं। अंग्रेज़ी सीरीयलों के दर्शको में 30 प्रतिशत का उछाल आया है। हिन्दी के दर्शकों में कितना उछाल आया है, यह बताना ज़रूर नहीं समझा। यह ज़रूर लिखा है कि 2016 की तुलना में 2017 में दर्शकों की संख्या में 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

एंकर ने आगे लिखा कि टीवी देखना का समय भी 6 प्रतिशत बढ़ा। इसे टाइम स्पेंट कहते हैं। रेटिंग मापने के लिए टाइम स्पेंट बहुत अहम तत्व होता है। 2017 में विराट कोहली को देखते ही रेटिंग 30 प्रतिशत बढ़ जाती थी। उनके हटते ही 50 फीसदी की कमी आ जाती थी। इसलिए कंपनियों ने विराट की शादी का खूब लाभ उठाया। अनुष्का के कपड़ों से जुड़ी एक कंपनी ने अपना 95 प्रतिशत विज्ञापन शादी के हफ्तों में ही दे दिया। इस तरह आप समझ सकते हैं कि टीवी की रेटिंग की दुनिया का गेम कैसे तय होता है और खिलाड़ी कैसे उस मौके का लाभ उठाते हैं।

अब बारी थी पीएम मोदी की

रवीश कहते है कि प्रधानमंत्री मोदी के बारे में लिखा है कि वे सबसे अधिक रेटिंग लाते हैं। लाते होंगे मगर इनका ज़िक्र विराट के बाद ग़ैर प्रमुखता से क्यों आया है जबकि हेडिंग तो ऐसे बनाई गई है कि प्रधानमंत्री विराट से भी ज़्यादा रेटिंग लाते हैं। प्रधानमंत्री का काम रेटिंग लाना नहीं है मगर रेटिंग एजेंसी का सीईओ जब उनके बारे में आंकड़े देकर दावा कर रहा है तब उम्मीद की जाती है कि वह ईमानदारी और संतुलन के साथ बताएगा। इस लेख में नहीं बताया है। अगर वे अलग से किसी लेख में बताते हैं तो स्वागत रहेगा।

पार्थों दासगुप्ता ने प्रधानमंत्री को रेटिंग लाने वाला बताने के लिए 15 अगस्त का आंकड़ा दिया। उस दिन 2 करोड़ 60 लाख लोगों ने उनका भाषण सुनने के लिए टीवी ऑन किया। जबकि पार्थों ने बताया कि 78 करोड़ लोग टीवी देखते हैं। 75 करोड़ ने टीवी ही नहीं देखा उस वक्त। दूसरा आपको यह भी देखना होगा कि क्या पार्थो 15 अगस्त के उस स्लाट की तुलना किससे कर रहे हैं। 2016 के 15 अगस्त से या किसी और दिन से। अगर पार्थों यह बात साफ साफ बताते कि विराट कोहली को देखने कितने लाख या करोड़ दर्शक आते तो हम तुलना कर पाते कि प्रधानमंत्री को कब लोग देखते हैं, कितने लोग देखते हैं और विराट को कितने लोग देखते हैं। पार्थों ने इतना कहा कि स्क्रीन पर विराट के आते ही 30 प्रतिशत रेटिंग उछल जाती है।

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जीएसटी का ऐलान टीवी से

रवीश ने बताया कि आधी रात को जीएसटी का एलान हुआ। संसद बैठी थी। उस दिन रेटिंग क्या रही, कितने मिलियन दर्शकों ने टीवी ट्यून इन किया, कुछ पता नहीं। क्या पार्थों को बार्क के डेटा में प्रधानमंत्री के लिए 15 अगस्त के अलावा कोई लैंडमार्क ही नहीं मिला। इसके अलावा गुजरात चुनाव के दौरान के भाषण थे। और भी कई भाषण थे। राहुल गांधी को भी गुजरात चुनावों के दौरान जगह मिली थी। बेहतर होता अगर वे प्रधानमंत्री के बहाने राजनीतिक हस्तियों की रेटिंग का सही से विश्लेषण पेश करते हैं। फिर एक दौर योगी का भी चला, उसका कुछ पता नहीं । योगी की रेटिंग का ज़िक्र होना चाहिए था ।

मैं रेटिंग में यकीन नहीं करता, उसके कई कारण है। पर कुछ सवाल हैं। मान लीजिए बार्क दावा करता है कि उसने 25000 मीटर लगाए हैं। फलां शो नंबर वन है। क्या बार्क बता सकता है कि 25000 मीटर में से कितने मीटर से नंबर वाले शो का नंबर आया? क्या आप जानना नहीं चाहेंगे कि नंबर वन शो को 25000 में 500 मीटर ने देखा या 2 मीटर के देखने से ही वह नंबर वन हो गया? मेरे ख़्याल से बार्क यह नहीं बताता है। वह दर्शकों की आनुपातिक संख्या प्रोजेक्टेड नंबर बताता है।

टीआरपी बोगस

टीआरपी बोगस है मगर टीवी की दुनिया इसी से चलती है। जो लोग टीआरपी तय नहीं करते, उनका टीवी देखना या न देखना बेकार है। टीवी के कंटेंट पर उनका कोई दावा नहीं रहता है। आप लाख बेरोज़गारी, स्वास्थ्य या जनता से जुड़े तमाम मुद्दों को लेकर सर पीटते रहें, मगर टीवी पर क्या चलेगा वह 25000 मीटर घरों की पसंद से तय होगा। आपके अपने घर में टीवी लगा लेने से नहीं। एक तरह से आप उन 25000 मीटर घरों की पसंद के लिए केबल का पैसा देते हैं। आप खुद के देखने के लिए नहीं, उनके देखने के लिए किसी तीसरे को पैसा देते हैं। नहीं समझे! मैं दुनिया का पहला ज़ीरो टीआरपी एंकर हूं।

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